Gwalior Fort Updates: क्या है दाता बंदी छोड़ दिवस का इतिहास? जानिए कैसे ग्वालियर किले पर लिखी गई सिख इतिहास की अमर गाथा
ग्वालियर: सनातन धर्म में भगवान श्री राम के लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली मनाई जाती है। वहीं, सिख समुदाय में भी इस पावन पर्व का एक विशेष और ऐतिहासिक महत्व है, जिसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। सिख धर्म में दिवाली मनाने की इस पावन परंपरा का सीधा नाता मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर और छटवें सिख गुरु गुरु हरगोविंद साहिब जी की अमृतसर वापसी की खुशी से जुड़ा हुआ है।
⛓️ ग्वालियर के किले में कैद किए गए थे गुरु हरगोविंद साहिब; मुगल दीवान ने रचा था गहरा षड्यंत्र
इतिहास और षड्यंत्र की पृष्ठभूमि:
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मुगल सुल्तान की कैद: इतिहास के अनुसार, मुगल बादशाह जहांगीर ने गुरु हरगोविंद साहिब जी को ग्वालियर दुर्ग (किले) में कैद कर लिया था। यह जहांगीर के दरबार के दीवान चंदू शाह द्वारा रचा गया एक राजनीतिक षड्यंत्र था।
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विवाह का प्रस्ताव ठुकराना: गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ के सेवादार सुक्खा सिंह बताते हैं कि चंदू शाह ने अपनी बेटी का रिश्ता गुरु हरगोविंद साहिब के लिए भेजा था, जिसे गुरु जी के पिता गुरु अर्जन देव जी ने ठुकरा दिया था। इससे चिढ़कर चंदू शाह ने गुरु साहिब को जान से मारने की नीयत से 40 दिनों की कैद के बहाने ग्वालियर किले में भिजवाया था।
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जेलर की सतर्कता: ग्वालियर किले के जेलर हरिदास दारोगा गुरु साहिब की महिमा से प्रभावित थे। उन्होंने गुरु साहिब को सतर्क किया कि उन्हें यहां मार डालने की योजना है। लेकिन गुरु साहिब शांत रहे और किले के अंदर प्रभु नाम का कीर्तन प्रारंभ कर दिया।
👑 52 हिंदू राजाओं ने लगाई थी मुक्ति की गुहार; गुरु साहिब ने धारण किया 52 कलियों वाला विशेष चोला
52 राजाओं की रिहाई का अद्भुत प्रसंग:
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कैद राजाओं की प्रार्थना: उस समय ग्वालियर दुर्ग में जहांगीर की कैद में भारत की विभिन्न रियासतों के 52 हिंदू राजा भी बंद थे। जब उन्हें गुरु साहिब के आध्यात्मिक तेज और प्रभाव का पता चला, तो उन्होंने अपनी रिहाई के लिए गुरु साहिब से प्रार्थना की।
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जहांगीर की शर्त: लगभग दो वर्ष और तीन महीने की कैद के बाद जब जहांगीर ने गुरु साहिब को रिहा करने का आदेश दिया, तो गुरु साहिब ने स्पष्ट शर्त रखी कि वे तभी बाहर जाएंगे जब उनके साथ कैद सभी 52 राजाओं को भी रिहा किया जाएगा।
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चोले की कलियां: जहांगीर ने कुटिलता से शर्त रखी कि गुरु साहिब के वस्त्र (चोले) को पकड़कर जितने राजा बाहर निकल पाएंगे, उन्हें ही छोड़ा जाएगा। तब गुरु हरगोविंद साहिब जी ने एक विशेष 52 कलियों वाला चोला तैयार करवाया। प्रत्येक राजा ने चोले की एक-एक कली थाम ली और गुरु साहिब के साथ सुरक्षित किले से बाहर आ गए।
🚩 ‘जय हो दाता बंदी छोड़’ के नारों से गूंज उठा किला; अमृतसर में दीपमाला से हुई दिवाली की शुरुआत
बंदी छोड़ नामकरण और दीपोत्सव:
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दाता बंदी छोड़ की उपाधि: राजाओं ने मुक्त होने पर अत्यंत भावुक होकर एक स्वर में जयकारा लगाया— “जय हो गुरु दाता बंदी छोड़, तेरी जय हो!” तभी से ग्वालियर के इस पवित्र स्थान का नाम गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ पड़ा।
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अमृतसर में खुशियों का पर्व: जब गुरु साहिब की रिहाई और अमृतसर आगमन का समाचार फैला, तो पूरे सिख समाज में खुशी की लहर दौड़ गई। श्रद्धालुओं ने गुरु साहिब के स्वागत में पूरे अमृतसर शहर को दीपमालाओं से रोशन कर दिया। इसी घटना के बाद से सिख धर्म में दीपावली (बंदी छोड़ दिवस) मनाने की महान परंपरा शुरू हुई।
🪔 धनतेरस से दीपावली तक 3 दिनों तक चलता है भव्य उत्सव; देश-विदेश से पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु
श्रद्धा, आस्था और उत्सव:
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दीपों से जगमगाता परिसर: हर वर्ष दीपावली के अवसर पर ग्वालियर दुर्ग पर स्थित गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ पर देश और विदेश से लाखों की संख्या में सिख श्रद्धालु दर्शन और अरदास के लिए पहुंचते हैं।
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अखंड पाठ और सेवा: पूरा गुरुद्वारा परिसर दुल्हन की तरह रोशनी से जगमगा उठता है। धनतेरस से शुरू होकर दीपावली तक तीन दिनों तक चलने वाले इस दीपोत्सव में निरंतर कीर्तन, अरदास और लंगर की सेवा का आयोजन किया जाता है।