Diwali Special: शुद्धता और परंपरा की मिसाल है छतरपुर की खुरचन, ग्राहकों की लगती है लंबी कतारें

छतरपुर: दीवाली का पावन पर्व हो और मुंह मीठा करने के लिए स्वादिष्ट मिठाइयां न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। बदलते दौर में बाजार में तमाम तरह की फैंसी मिठाइयां और आधुनिक चॉकलेट गिफ्ट्स आ चुके हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के छतरपुर की 100 साल पुरानी पुश्तैनी खुरचन का जादू आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहा है। दीवाली के इस खास मौके पर देश के महानगरों या विदेशों से अपने घर-शहर लौटने वाले प्रवासी इस पारंपरिक मिठाई को अपने साथ ले जाना बिल्कुल नहीं भूलते। छतरपुर के लोगों के लिए खुरचन खरीदना सिर्फ एक मिठाई लेना नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और बचपन की मीठी यादों को संजोकर साथ ले जाने का एक खूबसूरत जरिया है।

🌟 100 साल पुरानी जड़िया जी की दुकान; दीवाली पर प्रवासियों के बीच रहती है भारी मांग

परंपरा और दीवाली का उल्लास:

  • मिट्टी की खुशबू: दीवाली का त्योहार केवल दीपों की रोशनी और आतिशबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी जड़ों और पुराने जायके से जुड़ने का अवसर है। छतरपुर के बाजारों में आधुनिक मिठाइयों की भरमार के बावजूद ‘जड़िया जी की खुरचन’ की धाक आज भी कायम है।

  • परदेस से खिंचे चले आते हैं लोग: दिल्ली, मुंबई, इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में नौकरी या पढ़ाई कर रहे डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और छात्र जब दीवाली की छुट्टियों में अपने घर लौटते हैं, तो सबसे पहले इसी खुरचन का स्वाद चखते हैं।

  • प्रवासियों के अनुभव: दिल्ली में पदस्थ डॉक्टर आलोक हेमल बताते हैं कि जब भी वे दीवाली पर घर आते हैं, तो जड़िया की दुकान पर खुरचन खाने जरूर जाते हैं और वापसी में अपने दोस्तों के लिए पैक करवाकर ले जाते हैं। वहीं दिल्ली में पढ़ने वाले छात्र बेटू खान का कहना है कि महानगरों में ब्रांडेड मिठाइयां भले मिल जाएं, लेकिन छतरपुर के खुरचन का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।

🥛 एक किलो दूध में तैयार होती है मात्र 100 ग्राम खुरचन; बनाने की है बेहद अनूठी कला

खुरचन की निर्माण प्रक्रिया और कीमत:

  • शुद्धता और मेहनत: दुकान के संचालक गौतम जड़िया बताते हैं कि खुरचन पूरी तरह शुद्ध दूध से बनाई जाती है। इसकी खूबी पूरी तरह दूध की शुद्धता और बनाने की कारीगरी पर निर्भर करती है।

  • बनाने का तरीका: इसे तैयार करने में खासी मशक्कत करनी पड़ती है। सबसे पहले लोहे की कढ़ाई में शुद्ध दूध को बहुत ही धीमी आंच पर घंटों उबाला जाता है। इसे तब तक उबाला जाता है जब तक सारा दूध कढ़ाई में ही सूख न जाए और वह धीरे-धीरे कढ़ाई की सतह पर परत के रूप में चिपक न जाए।

  • परत-दर-परत खुरचन: इसके बाद कढ़ाई से परत-दर-परत खुरचन को सावधानी से निकाला जाता है। इसमें चीनी (शक्कर) का इस्तेमाल बहुत ही कम मात्रा में किया जाता है।

  • कीमत और त्योहारी मांग: यह शुद्ध खुरचन ₹600 प्रति किलोग्राम के भाव से बेची जाती है। त्योहारी सीजन खासकर दीवाली के इन 4-5 दिनों में इसकी मांग सामान्य दिनों से तीन से चार गुना बढ़ जाती है, जिसके चलते दुकान पर सुबह से ही ग्राहकों की लंबी कतारें लग जाती हैं।

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