जगदलपुर। दुर्गोत्सव के दौरान जब पंडालों में ढाक की थाप गूंजती है और धूप-दीप की सुगंध फैलती है, तब मां दुर्गा की आराधना में जुटा बंगाली समाज अपनी आस्था के साथ-साथ उस विस्थापन के दर्द को भी याद करता है जो उन्हें अपनी पुरखों की जमीन और घर छोड़कर यहां खींच लाया था। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित होकर बस्तर पहुंचे इन बंगाली हिंदू परिवारों ने कभी घने जंगलों और झोपड़ियों के बीच अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की थी। आज आड़ावाल का ओरना कैंप इस बात की जिंदा मिसाल है कि कैसे कड़े संघर्ष और अटूट मेहनत के बल पर इन परिवारों ने न केवल अपनी संस्कृति को जीवित रखा, बल्कि जगदलपुर के व्यापारिक विस्तार में भी अहम भूमिका निभाई है।
💰 झोपड़ियों की दुकान से करोड़ों के कारोबार तक का सफर: दंडकारण्य परियोजना से जुड़ी है विस्थापितों की यह गौरवशाली गाथा
ओरना कैंप बंगाली दुर्गोत्सव समिति के अध्यक्ष सुब्रतो बिश्वास बताते हैं कि उनके परिवार सहित कई अन्य परिवार 1964 में यहां आए थे, जब आड़ावाल के आसपास घना जंगल हुआ करता था। शुरुआती दिनों में लोगों ने छोटी-छोटी झोपड़ियों में दुकानें खोलकर जीवन शुरू किया था। समय के साथ एनएमडीसी की गतिविधियों और बढ़ते बाजार के बीच इन परिवारों ने अपनी मेहनत से व्यापार को नई ऊंचाइयां दीं। कभी झोपड़ी में छोटी किराना दुकान चलाने वाले परिवारों का कारोबार अब करोड़ों के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 1958 में शुरू की गई ‘दंडकारण्य परियोजना’ के तहत इन परिवारों का पुनर्वास हुआ था, जिन्होंने अपनी संस्कृति और उद्यमशीलता से बस्तर की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी है।