MP News: डिजिटल दौर में भी पोथियों में सुरक्षित है रियासतों का इतिहास, उज्जैन में Gen Z भी संभाल रहे पुरखों की विरासत

उज्जैन: आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा 26 सितंबर 2026 से श्राद्ध पक्ष प्रारंभ हो गया है, जो आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 11 अक्टूबर 2026 तक जारी रहेगा। श्राद्ध पक्ष में बड़ी संख्या में लोग पवित्र नदियों के किनारे बसी सप्तपुरियों (मोक्षदायिनी नगरियों) में पहुंचते हैं और अपने पितरों के तर्पण, पिंडदान तथा मोक्ष की कामना करते हैं। इस दौरान वे अपने तीर्थ पुरोहितों से तर्पण-पूजन करवाते हैं और अपने गोत्र-परिवार से जुड़ी जानकारियां प्राप्त करते हैं। मोक्षदायिनी नगरियों में अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका सहित कई अन्य शहर शामिल हैं।

📜 तलवार और आम वाले पंडा के परिवारों की कहानी

उज्जैन के तीर्थ पुरोहितों की पोथी परंपरा में पीढ़ियों से आने वाले यजमानों के परिवारों की जानकारियां दर्ज की जाती रही हैं। आज के दौर में जब लोगों को हर जानकारी डिजिटल रिकॉर्ड में तलाशने की आदत बन चुकी है, तब उज्जैन के लगभग 30 तीर्थ पुरोहित परिवार अब भी इन पारंपरिक पोथियों को अपनी विरासत के रूप में संभालकर रखे हुए हैं। पुरखों की विरासत, पितरों के मोक्ष के विधान और पुरखों की पहचान बताने वाले दो बड़े तीर्थ पुरोहित परिवारों से ईटीवी भारत की टीम ने बातचीत की है, जिनमें ‘तलवार वाले पंडा’ और ‘आम वाले पंडा’ का परिवार शामिल है।

🏰 पोथी में रियासतों-ठिकानों से लेकर परिवारों तक की कड़ियां

उज्जैन के रामघाट की पेड़ी पर ‘तलवार वाले पंडा’ के नाम से मशहूर तुषार गुरु ने बताया कि, ”उनके परिवार में यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। उनकी पोथियों में ढूंढाड़, मेवाड़ और मारवाड़ की प्रसिद्ध रियासतों में उदयपुर, जयपुर, जोधपुर के साथ-साथ प्रतापगढ़ तथा मध्य प्रदेश के रतलाम, जावरा, खाचरोद आदि क्षेत्रों की रियासतों एवं ठिकानों से जुड़े परिवारों की जानकारियां मौजूद हैं।” तुषार गुरु का कहना है कि पुराने समय में 1000 साल पुराने गढ़ों और ठिकानों से जुड़े परिवार भी उज्जैन आकर पितरों के तर्पण और श्राद्ध करवाते थे, जिनके परिवार आज भी यहां आ रहे हैं।

🗓️ अंग्रेजी तारीख की जगह विक्रम संवत दर्ज

तुषार गुरु ने बताया, “एक खास बात यह है कि हम रिकॉर्ड दर्ज करते समय अंग्रेजी तारीख का उल्लेख नहीं करते हैं। हम आज भी विक्रम संवत (हिंदू पंचांग) के हिसाब से ही चलते हैं। मिसाल के तौर पर, यदि जावरा रियासत का कोई परिवार तर्पण के लिए आया, तो परिवार की पहचान के साथ तिथि, वार, माह और संवत की जानकारी दर्ज की जाती है। इसी आधार पर आने वाली पीढ़ियों के रिकॉर्ड को आगे बढ़ाया जाता है। यह सिर्फ राजपूत समाज का ही नहीं, बल्कि सर्व समाज के रिकॉर्ड की पोथियों का संग्रह है, जिसमें पाटीदार, तेली सहित अन्य सभी जातियां एक ही क्रम में शामिल हैं।”

🔍 इस तरीके से निकाल सकते हैं पूर्वजों की जानकारी

तुषार गुरु का कहना है कि, ”यदि किसी परिवार को अपने पुराने कुलगुरु, पैतृक गांव या परिवार की जानकारी स्पष्ट रूप से याद नहीं है, लेकिन उसे अपने पूर्वजों के गांव या क्षेत्र के बारे में पता है, तो पुरानी पोथियों में उस परिवार से जुड़ी जानकारी तलाशने में मदद मिल सकती है। परिवार में नए सदस्य जुड़ने पर उनके नाम भी रिकॉर्ड में जोड़ दिए जाते हैं। इस तरह परिवार की जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ती रहती है।”

📖 52 ठिकाना रियासतों से जुड़े परिवारों का रिकॉर्ड

तलवार वाले पंडा के पंडित गोलू दुबे बताते हैं कि, ”उनकी परंपरा में अलग-अलग समुदायों के यजमानों की जानकारी रखी जाती है, लेकिन वे विशेष रूप से 52 ठिकाना रियासतों से जुड़े परिवारों का उल्लेख अपने पास रखते हैं। इस परंपरा को वर्तमान समय में अशोक दुबे और उनके पुत्र पंकज दुबे तथा कोमल दुबे आगे बढ़ा रहे हैं।”

✍️ पोथी में कैसे दर्ज होता है पूरा परिवार?

तुषार और गोलू दुबे के अनुसार, “रिकॉर्ड दर्ज करने की प्रक्रिया में सबसे पहले ज़िला और फिर गांव सहित पुरानी रियासत या ठिकाने का नाम आता है। इसके बाद गोत्र, परिवार के मुखिया का नाम, उनके भाई, फिर मुखिया के पुत्रों और भाइयों के पुत्रों जैसी जानकारियां दर्ज की जाती हैं। साथ ही तर्पण की तिथि और हिंदू पंचांग के अनुसार संवत भी दर्ज किया जाता है। वर्तमान समय में रियासतों और ठिकानों की जगह अब तहसील और ज़िलों के नाम दर्ज किए जाते हैं, और इसी क्रम में यह परंपरा आगे बढ़ रही है।”

🥭 आम वाले पंडा की पोथी

क्षेत्र पंडा समिति के अध्यक्ष पंडित राजेश त्रिवेदी ने बताया कि यह एक प्राचीन तीर्थ परंपरा है। यदि कोई परिवार समय के साथ अपना गांव बदलकर किसी दूसरे गांव में बस गया, तो नई जगह की जानकारी भी रिकॉर्ड में जोड़ दी जाती रही है। इसका उद्देश्य यह है कि आने वाली पीढ़ी चाहे कहीं से भी आए, उसकी पारिवारिक पहचान को पुराने रिकॉर्ड से जोड़ा जा सके। राजेश त्रिवेदी अपने ही परिवार का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि, ”उनके अपने वंश के रिकॉर्ड में राजेश पिता विद्याधर, दादा कालूराम, परदादा राजाराम, फिर ओंकार, मंगल, सुखानंद जैसी 10 से 11 पीढ़ियों की जानकारी मौजूद है।”

💻 कंप्यूटर से पहले के सर्च सिस्टम जैसी भूमिका

पंडित राजेश त्रिवेदी बताते हैं कि डिजिटल दौर में, जहां नाम और डेटा कुछ ही सेकंड में खोज लिया जाता है, पारंपरिक पोथी-व्यवस्था को भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। यदि यजमान अपना नाम, जाति, गोत्र और गांव बताता है, तो उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित परिवार की जानकारी उसके क्षेत्र व समाज की पोथी में आसानी से खोजी जा सकती है।

👑 सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ का पोथियों में उल्लेख

पंडित राजेश त्रिवेदी बताते हैं कि, ”रियासतों के दौर में सिंधिया और होलकर से लेकर पंवार, देवास, राजगढ़ तथा धार क्षेत्र से जुड़े परिवारों और बड़ौदा के गायकवाड़ एवं सोलापुर के राजपरिवार सहित कई राजघरानों की उज्जैन आने की परंपरा रही है।”

🧑‍🎓 अब परंपरा में Gen Z की भागीदारी

इस पूरी परंपरा का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसे सिर्फ बुजुर्ग पीढ़ी ही नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है। 25 वर्षीय पंडित पुष्कर त्रिवेदी इसी परंपरा की नई पीढ़ी का चेहरा हैं। वे ‘आम वाले पंडा’ हैं और खुद को राजगुरु बताते हैं। वे पितृ पूजन एवं तर्पण की विधियां करवाते हैं। पुष्कर बताते हैं कि, ”उन्हें बचपन से ही परिवार ने सिखाया कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक विरासत भी है।” उन्होंने स्कूल के समय से ही परिवार के कार्यों में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था।

🎓 पांचवीं कक्षा से वेद, फिर वेद और ज्योतिष में M.A.

पुष्कर ने करीब 10-11 वर्ष की उम्र (पांचवीं कक्षा) से वेद का अध्ययन शुरू किया था। आगे चलकर उन्होंने तीर्थ क्षेत्र की परंपराओं, पोथी-व्यवस्था, यजमानों से संवाद, मंत्रों और कर्मकांड की बारीकियां अपने पिता व दादा से सीखीं। उनकी औपचारिक स्कूली शिक्षा में कॉमर्स विषय रहा, लेकिन आगे उन्होंने वेद और ज्योतिष में M.A. किया। उनके सामने नौकरी या किसी अन्य पेशे में जाने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उनका उद्देश्य आने वाली पीढ़ी तक इस परंपरा को पहुंचाना और इसे संभालकर रखना है।

❓ नई पीढ़ी अब सिर्फ ‘कैसे’ नहीं, ‘क्यों’ भी पूछती है

आम वाले पंडा राजेश त्रिवेदी बताते हैं कि, ”आज का यजमान कर्मकांड को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं अपनाना चाहता, बल्कि यह भी पूछता है कि कोई विधि क्यों की जाती है? तर्पण की प्रक्रिया ऐसी ही क्यों है? पूजा में पति-पत्नी के बैठने की व्यवस्था क्या है और मंत्रों का अर्थ क्या है? वे सब कुछ जानना चाहते हैं। इसी बदलाव को देखते हुए तीर्थ पुरोहित परिवार भी नई पीढ़ी को वेद, पुराण, शास्त्र और कर्मकांड के ज्ञान के साथ-साथ उनके आधुनिक सवालों के उत्तर देने के लिए तैयार कर रहे हैं।”

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