Viral News: बच्चों के भविष्य के लिए जान जोखिम में डाल रहीं दो शिक्षिकायें; बलरामपुर कलेक्टर ने सराहा जज्बा

अंबिकापुर। बच्चों की शिक्षा और अपने कर्तव्य के प्रति शिक्षिकाओं के अटूट समर्पण की एक अद्भुत मिसाल छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड अंतर्गत धौरपुर गांव में देखने को मिल रही है।

यहाँ के शासकीय प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षिका कर्मिला टोप्पो अपनी महज नौ माह की मासूम बेटी को गोद में लेकर उफनती नदी को पार करते हुए प्रतिदिन स्कूल पहुँचती हैं, ताकि गांव के नौ मासूम बच्चों का भविष्य अंधेरे में न रहे। उनके साथ शाला की दूसरी शिक्षिका संध्या हलदार भी रोजाना इसी तरह अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुँचती हैं। दोनों शिक्षिकाओं के इस असाधारण जज्बे की कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने भी खुले दिल से सराहना की है।

🌲 जंगलों के बीच बसा है धौरपुर गांव: 3 किलोमीटर का पथरीला रास्ता और फिर नदी का संगम

वाड्रफनगर जनपद क्षेत्र की मढ़ना ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम धौरपुर घने जंगलों के बीच बसा हुआ एक छोटा सा गांव है, जहाँ लगभग 15 से 20 परिवार निवास करते हैं।

राज्य शासन द्वारा वर्ष 2005 से यहाँ प्राथमिक शाला का संचालन किया जा रहा है, जिसमें इस शैक्षणिक सत्र में कुल नौ बच्चे दर्ज हैं। स्कूल तक पहुँचने के लिए शिक्षिकाओं को रोजाना तीन किलोमीटर का कठिन और पथरीला रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। इसके बाद मोरन और इरिया नदी के खतरनाक संगम को पैदल पार करके स्कूल पहुंचना होता है।

🎒 वर्ष 2014 से पदस्थ हैं शिक्षिका कर्मिला: बोलीं— “बच्चे इंतजार करते हैं, इसलिए आना पड़ता है”

शिक्षिका कर्मिला टोप्पो वर्ष 2014 से लगातार इसी दूरस्थ प्राथमिक शाला में अपनी सेवाएं दे रही हैं और हर बरसात में उन्हें इसी तरह के कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ता है।

गोद में अपनी छोटी बेटी को लिए शिक्षिका कर्मिला ने बताया, “नदी पार करते समय डर तो बहुत लगता है, पानी का बहाव बेहद तेज रहता है और पैर फिसलने का खतरा बना रहता है। लेकिन स्कूल में बच्चे हमारा इंतजार करते हैं और रोज मासूमियत से पूछते हैं कि दीदी कल आओगी न…। बस उन्हीं बच्चों के भविष्य के लिए आना पड़ता है। बेटी को घर पर देखभाल के लिए छोड़ने की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए उसे भी साथ लेकर आती हूँ।”

❓ शासकीय व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं पर उठे गंभीर सवाल: आज तक नहीं बना पहुंच मार्ग

एक तरफ जहां दोनों शिक्षिकायें जान जोखिम में डालकर अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर शासन और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्षेत्रवासियों का कहना है कि बरसात के मौसम में धौरपुर के बच्चों को अस्थायी रूप से नजदीकी आश्रम या बालक छात्रावास में शिफ्ट किया जा सकता है, जिससे उनकी पढ़ाई भी बाधित न हो और शिक्षिकाओं को भी अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े। सरकार अंतिम व्यक्ति तक हर सुविधा पहुँचाने का दावा करती है, लेकिन इस गांव तक आज तक एक पक्का पहुँच मार्ग क्यों नहीं बन सका, यह एक बड़ा और अनुत्तरित प्रश्न है।

🎖️ कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने सराहा: बोलीं— “यह जज्बा पूरे जिले के लिए प्रेरणा और गर्व का विषय”

मामला संज्ञान में आने के बाद बलरामपुर कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने शिक्षिकाओं के इस समर्पण की जमकर तारीफ की है।

कलेक्टर ने कहा, “मुझे मीडिया के माध्यम से जिले की इस समर्पित शिक्षिका के बारे में जानकारी मिली, जो मानसून में भी अपने छोटे बच्चे को गोद में लेकर नदी पार करते हुए 3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुँचती हैं। अपनी अटूट निष्ठा और कठिन परिश्रम से उन्होंने जिले के सभी शिक्षकों के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। मैं ऐसे समर्पित शिक्षकों का दिल से सम्मान करती हूँ। उनके जैसी शिक्षिकाओं को सम्मानित करना पूरे जिले के लिए अत्यंत गर्व और गौरव की बात है।”

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