नक्सली बसवराजू के अंतिम संस्कार पर विवाद, क्या छत्तीसगढ़ पुलिस ने कोर्ट के आदेश को किया दरकिनार?

नक्सली केशव राव (उर्फ बसवराजू) के अंतिम संस्कार पर विवाद हो गया है. प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव बसवराजू के परिवार ने छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ अवमानना ​​याचिका दायर की है. याचिका में पुलिस पर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है. कहा गया है कि अंतिम संस्कार करने के लिए कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ.

अदालत ने पहले पुलिस को बसवराजू का शव उसके परिजनों को सौंपने का निर्देश दिया था. हालांकि, 26 मई को पुलिस ने बसवराजू समेत सात माओवादी नेताओं के शवों का अंतिम संस्कार कर दिया, जबकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से आए परिवार 22 मई से ही नारायणपुर जिला अस्पताल के बाहर डेरा डाले हुए थे. बसवराजू सहित 26 अन्य नक्सली 21 मई को नारायणपुर के अबूझमाड़ जंगल में मारे गए थे. यह ऑपरेशन जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) ने चलाया था.

कोर्ट ने क्या कहा था?

24 मई को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ पुलिस को निर्देश दिया था कि वो बसवराजू के शव का पोस्टमार्टम करने के बाद परिजनों को सौंप दे. परिजनों ने शव को पैतृक स्थान पर ले जाने और अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई थी. इसके बावजूद पुलिस ने दावा किया कि सातों शवों का कोई कानूनी दावेदार नहीं है.

पुलिस ने कहा कि सभी नक्सलियों का अंतिम संस्कार नारायणपुर में कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के साथ कानूनी प्रक्रिया के अनुसार किया गया. पुलिस ने दावा किया कि उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अंतिम संस्कार किया गया और इसमें सभी बुनियादी और मानवीय शिष्टाचार बरता गया था.

परिवार ने क्या आरोप लगाया?

हालांकि, परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्हें पुलिस अधीक्षक कार्यालय और अस्पताल के बीच दौड़ाया गया ताकि वे यह प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकें कि वे वास्तव में मृतक के परिवार के सदस्य हैं. केशव राव के छोटे भाई नंबाला रामप्रसाद ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि शव बुरी तरह सड़ चुका है.

उन्होंने कहा कि शव सड़ चुके हैं और शव को कब्जे में लेने की अनुमति देना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन जाएगा. हालांकि, हम शव को लेने और अपने गांव लौटने की अपनी मांग पर अड़े रहे. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. उन्होंने हमें एक अल्टीमेटम दिया कि शवों का अंतिम संस्कार 25 मिनट के भीतर कर दिया जाएगा और परिवार के सभी सदस्यों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करने के लिए कहा. लेकिन हम नहीं माने.

रामप्रसाद ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उनकी हिंदी न समझने का फायदा उठाने की कोशिश की और उनसे हिंदी में लिखे कुछ कागजात पर दस्तखत करने को कहा. उन्होंने कहा, मुझे समझ नहीं आया कि वह क्या था.

दस्तावेज में रामप्रसाद की ओर से परिवार को अपने भाई की अस्थियां मुहैया कराने के लिए लिखी गई याचिका थी. याचिका में कहा गया है कि चूंकि वह यह साबित करने के लिए वैध दस्तावेज नहीं दे सका कि वह केशव राव का भाई है, इसलिए जिला और पुलिस प्रशासन ने जन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के चलते शव का अंतिम संस्कार कर दिया.

बसवराजू के भाई ने ये भी आरोप लगाया

केशव राव के बड़े भाई ढिल्लेश्वर राव ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके भाई रामप्रसाद को गिरफ़्तार करने की कोशिश की थी क्योंकि उन्होंने दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था. गिरफ़्तारी के डर से रामप्रसाद मंगलवार, 27 मई की रात को आंध्र प्रदेश पहुंच गए.

ढिल्लेश्वर राव ने दुख व्यक्त किया कि उनका परिवार मृतक माओवादी नेता के पार्थिव शरीर को भी नहीं देख पाया. वह हमें 45 साल पहले छोड़कर चला गया. मेरी मां 82 साल की हैं. हम आखिरी बार उसका चेहरा देखना चाहते थे. हम अपने रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करना चाहते थे और उसे अपने पिता के बगल में दफनाना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने ऐसा करने से मना कर दिया. यह अदालत के आदेशों की अवमानना ​​के अलावा और कुछ नहीं है.

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