मोहाली उपभोक्ता आयोग ने सिर्फ 500 रुपए हर्जाना भरने के दिए आदेश

चंडीगढ़। मोहाली स्थित विशाल मेगा मार्ट द्वारा कैरी बैग चार्ज किए जाने की एक शिकायत पर मोहाली उपभोक्ता आयोग ने इसे 500 रुपए हर्जाना भरने के आदेश दिए हैं। शिकायतकर्ता ने कैरी बैग के 18 रुपए ​​​​​​​वसूलने पर 83 हजार रुपए हर्जाना दिए जाने की मांग की। हालांकि आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सिर्फ 500 रुपए हर्जाना विशाल मेगा मार्ट को भरने को कहा है।वहीं कहा है कि यह हर्जाना सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग अपील केस में आने वाले फैसले पर निर्भर करेगा। मोहाली फेज 6 की ऋचा शर्मा ने फेज 5 स्थित विशाल मेगा मार्ट को इसके इंचार्ज/मैनेजर/प्रौपराइटर के जरिए पार्टी बनाते हुए मार्च, 2022 में शिकायत दायर की थी।शिकायतकर्ता का कहना था कि वह 2 मार्च, 2022 को विशाल मेगा मार्ट में सामान खरीदने गई थी। जब सामान का बिल बना तो वह हैरान हो गई कि उसमें 18 रुपए कैरी बैग के जोड़े गए हैं। उन्होंने इसका विरोध भी किया था। हालांकि उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसे गलत व्यापारिक गतिविधियां बताया गया था। शिकायतकर्ता ने आयोग में शिकायत दायर कर कैरी बैग के 18 रुपए एवं उन्हें हुई मानसिक प्रताड़ना तथा विशाल मेगा मार्ट की कथित गलत व्यापारिक गतिविधियों एवं अदालती खर्च के रुप में 83 हजार रुपए का मुआवजा मांगा था। वहीं मांग की गई थी कि इसे आदेश दिए जाए कि 2 लाख रुपए कंज्यूमर लीगल एड फंड में डाले।सहमति के बाद ही कैरी बैग चार्ज किया थाआयोग में विशाल मेगा मार्ट की ओर से पेश जवाब में शिकायत को आधारहीन और गलत धारणा पर आधारित बताया था। कहा गया कि शिकायतकर्ता की सहमति के बाद ही कैरी बैग चार्ज किया गया था। स्टोर के एंट्रेस पर नोटिस और सिग्नेज लगाए हुए हैं कि कस्टमर अपने साथ कैरी बैग ला सकते हैं। वहीं बिलिंग काउंटर पर भी नोटिस लगाया हुआ है कि कस्टमर सामान के लिए अपनी पसंद का कैरी बैग खरीद सकते हैं। शिकायतकर्ता ने अपनी मर्जी से कैरी बैग खरीदा था।इन अहम सवालों पर आयोग ने किया विचारआयोग ने इस अहम सवाल पर सुनवाई की, कि क्या विशाल मेगा मार्ट शिकायतकर्ता द्वारा सामान खरीदने, बिल तैयार करने और सामान देते समय अलग से कैरी बैग चार्ज कर सकता है। आयोग ने कहा कि पहले प्रैक्टिस होती थी कि जब कोई व्यक्ति सामान खरीदता था तो दुकानदार उसे कैरी बैग देता था। वहीं अब लगभग पूरे देश में प्लास्टिक बैग पर बैन हो गया है। ऐसे में हो सकता है कि शिकायतकर्ता यह सोच रखता हो कि जब वह कोई सामान खरीदेगा तो यह रिटेन आउलटेज की ड्यूटी है कि वह कैरी बैग देगा।वहीं दूसरा अहम सवाल यह रहा कि क्या विशाल मेगा मार्ट के लिए यह ज़रुरी है कि वह नोटिस और जानकारी के माध्यम से पहले ही अपने उपभोक्ता को बताए कि वह कैरी बैग चार्ज करेगा या कस्टमर अपने साथ कैरी बैग लेकर आए। आयोग ने कहा कि यह साबित हुआ है कि शिकायतकर्ता पर कैरी बैग लेने के लिए दबाव बनाया गया। आयोग ने कहा कि रिटेल आउटलेट्स में सामान्य प्रैक्टिस यह है कि वह कस्टमर को बिना किसी कीमत के कैरी बैग उपलब्ध करवाएं ताकि वह खरीदा हुआ सामान सुविधाजनक तरीके से अपने घर तक लेकर जा सकें।शिकायतकर्ता को मजबूर किया गयाआयोग के मुताबिक मौजूदा केस में शिकायतकर्ता को कैरी बैग के लिए मजबूर किया गया और ऐसा करने का विशाल मेगा मार्ट का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। यह अवश्य ही गलत व्यापारिक गतिविधियों की श्रेणी में आता है। आयोग ने कहा कि उन्हें लगता है कि ऐसा कोई पूर्व जानकारी उपभोक्ता को ख़रीददारी से पहले नहीं दी जाती कि उन्हें सामान खरीदने पर कैरी बैग चार्ज किया जाएगा। आयोग ने कहा कि मार्किट में यह गलत प्रथा चली हुई है।उपभोक्ता के इन अधिकारों पर बोला आयोगआयोग ने कहा कि उपभोक्ता को अपनी पसंद के किसी विशेष रिटेल आउटलेट में जाने और सामान खरीदने से पहले यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि कैरी बैग के लिए अतिरिक्त रकम वसूली जाएगी। वहीं उपभोक्ता को प्रतिवादी पक्ष(रिटेल आउटलेट) से जुड़ी अहम जानकारियों और कैरी गुड्‌स(कैरी बैग आदि) के बारे में जानने का अधिकार होना चाहिए। वहीं पूर्व जानकारी और नोटिस भी उपभोक्ता का अधिकार होना चाहिए ताकि उपभोक्ता के पास ख़रीददारी के लिए आउटलेट्स का विकल्प हो।सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील केसआयोग ने कहा कि उन्होंने कुछ ऐसे मामलों में फैसला दिया था। उन केसों में प्रतिवादी पक्ष के वकील ने बताया था कि रिलायंस रिटेल लिमिटेड बनाम धर्म पाल एवं अन्य के मामले में स्पेशल लीव टू अपील सुप्रीम कोट में लंबित है। आयोग ने कहा कि उन्होंने स्पेशल लीव टू अपील का 12 मई, 2022 का वह ऑर्डर पढ़ा है। उसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है था कि याची चह मौजूदा मामले की पेंडेंसी की जानकारी संबंधित आयोग में दे सकते हैं। आयोग ने मौजूदा शिकायत को मंजूर कर लिया और विशाल मेगा मार्ट को आदेश दिए हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिलायंस रिटेल लिमिटेड के स्पेशल लीव टू अपील केस में आने वाले फैसले के आधार पर शिकायतकर्ता को हुई मानसिक पीड़ा, शोषण और अदालती खर्च के रूप में 500 रुपए भरेगा।

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