MP Updates: गणेश चतुर्थी से जुटने वाले माटी शिल्पकारों को नहीं मिल रहा उचित दाम, क्या विलुप्त हो जाएगी परंपरा?
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में दीपावली का पावन पर्व नजदीक आते ही बाजारों में खासी रौनक देखने को मिल रही है। घर-आंगन को जगमग रोशन करने के लिए बाजार भांति-भांति के रंग-बिरंगे और आकर्षक दीयों से सज चुके हैं। गुजरात से आने वाले डिजाइनर दीयों और रेडीमेड दीपकों की आधुनिक चमक ग्राहकों को खूब आकर्षित कर रही है, लेकिन इसी चमक-धमक के बीच अपनी मेहनत से माटी को नया आकार देने वाले स्थानीय कुम्हारों की रात-दिन की मेहनत अनदेखी होती नजर आ रही है। पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला को सहेज रहे माटी शिल्पकारों के सामने अब आसमान छूती लागत और बेहद कम मुनाफे के कारण अपने परिवार का भरण-पोषण करना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
🏠 पीढ़ियों से चला आ रहा कारोबार, लेकिन परिवार का भरण-पोषण हुआ बेहद मुश्किल
बड़वानी शहर के धोबड़िया तालाब क्षेत्र के कारीगरों की जमीनी हकीकत:
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महीनों की मेहनत: धोबड़िया तालाब क्षेत्र में करीब सात-आठ परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के पारंपरिक दीपक बनाने के पुश्तैनी काम से जुड़े हुए हैं। इन परिवारों के लिए दीपावली की तैयारियां गणेश चतुर्थी से ही शुरू हो जाती हैं।
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पूरा परिवार शामिल: घर के छोटे बच्चों, महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक, सभी मिलकर दीये तैयार करने में जुट जाते हैं। प्रत्येक परिवार औसतन दो से तीन हजार दीपक तैयार करता है।
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दाम में भारी असमानता: कई दिनों की कड़ी मेहनत के बाद तैयार होने वाले इन मिट्टी के दीपकों को बाजार में महज ₹20 प्रति दर्जन के भाव से बेचना पड़ रहा है, जबकि गुजरात से आए रेडीमेड फैंसी दीये बाजार में ₹40 प्रति दर्जन तक आसानी से बिक रहे हैं। ऐसे में स्थानीय कारीगरों को उनकी हाड़-तोड़ मेहनत के अनुरूप उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
💸 दीपक निर्माताओं पर महंगाई की दोहरी मार: मिट्टी से लेकर बिजली तक सब हुई महंगी
लागत में हुए भारी इजाफे से परेशान कुम्हार:
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महंगी मिट्टी: स्थानीय दीपक निर्माता गौरव गोले बताते हैं कि पहले मिट्टी आसानी से और बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती थी, लेकिन अब एक ट्रॉली कच्ची मिट्टी के लिए करीब ₹3,000 तक खर्च करने पड़ते हैं।
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इलेक्ट्रॉनिक चाक का खर्च: पहले हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर दीये बनाए जाते थे, लेकिन समय की बचत के लिए अब इलेक्ट्रॉनिक चाक का उपयोग करना पड़ रहा है। इससे काम में तेजी तो आई है, लेकिन बिजली का भारी-भरकम खर्च बढ़ गया है।
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बिजली बिल में भारी उछाल: एक अन्य दीपक निर्माता दुर्गा गोले के अनुसार, पहले जहां पूरे सीजन का बिजली का बिल ₹200 से ₹500 तक आता था, अब वह बढ़कर ₹1,500 से ₹2,000 तक पहुँच गया है। मिट्टी, बिजली और ईधन के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन दीपकों के बिक्री मूल्य में उस हिसाब से वृद्धि नहीं हो पा रही है।
🧱 कई दिनों की जटिल और कठिन मेहनत से आकार लेता है एक मिट्टी का दीपक
मिट्टी के दीये बनाने की चरणबद्ध और कठिन प्रक्रिया:
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मिट्टी की छनाई व भिगोना: सबसे पहले बाहर से लाई गई सूखी मिट्टी को अच्छी तरह छानकर पानी में भिगोया जाता है।
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गूंथना व कंकड़ निकालना: इसके बाद उसे सुखाकर हाथों से अच्छी तरह गूंथा जाता है और उसमें मौजूद एक-एक छोटे कंकड़-पत्थर को चुनकर अलग किया जाता है।
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चाक पर आकार देना: गूंथी हुई मिट्टी को इलेक्ट्रॉनिक चाक पर रखकर बड़ी कुशलता से सुंदर दीपकों का आकार दिया जाता है।
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सुखाना और पकाना: तैयार दीपकों को कुछ दिनों तक धूप में सुखाने के बाद भट्टी (आवा) की आग में घंटों पकाया जाता है। तब जाकर ये दीपक बाजार में बिकने लायक हो पाते हैं।
🤝 स्थानीय कारीगरों से दीये खरीदकर बचाएं माटी कला की यह समृद्ध परंपरा
स्थानीय शिल्पकारों को आपके सहयोग की आवश्यकता है:
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विषम चुनौतियां: कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मशीनी, रेडीमेड और कृत्रिम डिजाइन वाले दीपकों से मिल रही सीधी प्रतिस्पर्धा है। लागत का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है, लेकिन पारंपरिक मिट्टी के दीपकों को उनका वाजिब हक नहीं मिल पा रहा।
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माटी कला को संरक्षण: इस दीपावली पर स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदना केवल अपने घर को रोशन करने का जरिया भर नहीं है, बल्कि यह उन गरीब परिवारों की आजीविका को सहारा देने और हमारी सदियों पुरानी माटी कला को जिंदा रखने का एक सार्थक प्रयास है। यदि हम सभी ‘लोकल फॉर वोकल’ को प्राथमिकता दें, तो माटी कला की यह समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक जगमगाती रह सकती है।