Yuva Dharm Sansad Ujjain: उज्जैन में युवा धर्म संसद का दूसरा दिन; संघ प्रमुख ने बताया धर्म का वास्तविक अर्थ

उज्जैन। उज्जैन के देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद’ के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया।इस अवसर पर संघ प्रमुख ने युवाओं को संबोधित करते हुए धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया और जीवन में इसके नैतिक एवं व्यावहारिक महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।

🕉️ “रिलीजन का अर्थ धर्म नहीं होता”: संघ प्रमुख ने बताया रिलीजन और धर्म का सूक्ष्म अंतर

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि ‘रिलीजन’ का अर्थ ‘धर्म’ कदापि नहीं होता। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा और शब्दकोश में धर्म के लिए कोई सटीक पर्यायवाची शब्द मौजूद ही नहीं है।

‘रिलीजन’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘रिलिजियो’ से हुई है, जो किसी को बांधने का संकेत देता है; जबकि भारतीय संस्कृति में धर्म किसी को बांधता नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति इसके मूल भाव को मिटाना चाहती है, इसीलिए इसे रिलीजन का नाम देती है। स्वामी विवेकानंद का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मप्राण देश है। किसी भी नई जिज्ञासा या विचार को समझने से पहले अपने मन को स्थिर और खाली करना आवश्यक है।

📚 देशभर से जुटे 1,700 युवा और विद्वान: AI और सूचना-विचार संघर्ष पर हो रहा विस्तृत संवाद

उल्लेखनीय है कि इस युवा धर्म संसद में देशभर से लगभग 1,700 युवा छात्र-छात्राएं तथा 300 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य हिस्सा ले रहे हैं। प्रसिद्ध गीतकार और पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

संसद के दौरान धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा वर्तमान दौर के सूचना-विचार संघर्ष जैसे ज्वलंत विषयों पर गहन व्याख्यान और संवाद आयोजित किए जा रहे हैं।

🧭 “धर्म केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, युवाओं को दिखाता है सही दिशा”: किसी को पीड़ा न देना ही सबसे बड़ा धर्म

कार्यक्रम के दौरान डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों या सेवानिवृत्त लोगों के लिए नहीं है, बल्कि यह युवाओं को जीवन में सही दिशा दिखाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

उन्होंने उल्लेख किया कि महाभारत के अंतिम पांच श्लोक पूरी महाभारत का वास्तविक सार हैं। जीवन में धर्म के मार्ग पर चलकर ही काम, अर्थ और मोक्ष की सिद्धि होती है। धर्म को बोझ मानकर रोते-रोते चलने के बजाय यदि इसे समझकर जीवन में अपनाया जाए, तो जीवन सार्थक बन जाता है। किसी भी जीव को पीड़ा न देना ही सबसे बड़ा धर्म है और पीड़ा पहुंचाना महापाप है।

⛩️ सेवाज्ञ संस्थानम् का भव्य आयोजन: अयोध्या के पीठाधीश्वर के मार्गदर्शन में छठा संस्करण, अगला आयोजन द्वारका में

सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा सिद्धपीठ हनुमत निवास, अयोध्या के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज के पावन मार्गदर्शन में युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण आयोजित किया जा रहा है।

इससे पूर्व काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में इसके सफल आयोजन हो चुके हैं। अब इसका अगला संस्करण भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका में आयोजित किया जाएगा।

👥 दिग्गज विद्वानों और आचार्यों की उपस्थिति: युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे विषय विशेषज्ञ

उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी और सेवाज्ञ संस्थानम् के अध्यक्ष आशीष कुमार आशु उपस्थित रहे।

विभिन्न व्याख्यान सत्रों में जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज, अनादि फाउंडेशन की सह-संस्थापिका स्मृति अनंतलक्ष्मी और प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंद कुमार भी उपस्थित रहकर युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

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