जौनपुर की शाहजहां बानो बनीं ‘प्रतीक्षा’: सनातन धर्म अपनाकर बरेली के आश्रम में प्रेमी पवन संग रचाया विवाह

बरेली (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के बरेली जिले स्थित सुप्रसिद्ध अगस्त्य मुनि आश्रम में एक अनूठा और आस्था से परिपूर्ण विवाह संपन्न हुआ। जौनपुर जिले की रहने वाली शाहजहां बानो ने अपनी स्वेच्छा से सनातन धर्म स्वीकार कर अपना नया नाम ‘प्रतीक्षा’ रखा। इसके पश्चात उन्होंने प्रतापगढ़ निवासी अपने प्रेमी पवन के साथ पवित्र वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सात फेरे लेकर जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाने का अटूट संकल्प लिया। अब इस अनोखे अंतरधार्मिक विवाह की पूरे प्रदेश में चर्चा हो रही है।

👩‍❤️‍👨 10 वर्षों का अटूट प्रेम: कॉलेज के दिनों से शुरू हुई थी पवन और प्रतीक्षा की प्रेम कहानी

पवन और प्रतीक्षा (पूर्व नाम शाहजहां बानो) की प्रेम कहानी भी अत्यंत दिलचस्प है। जौनपुर जिले के भीलमपुर की निवासी शाहजहां बानो और प्रतापगढ़ के भोजेमऊ गांव निवासी पवन की पहली मुलाकात स्कूल के दिनों में हुई थी।

आगे चलकर एक ही महाविद्यालय (कॉलेज) से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के दौरान दोनों की दोस्ती प्रगाढ़ प्रेम संबंध में बदल गई। लगभग 10 वर्षों तक लगातार एक-दूसरे के संपर्क में रहने के बाद दोनों ने परिणय सूत्र में बंधने का निर्णय लिया। जब परिजनों की ओर से सहमति नहीं मिली, तो बालिग होने के नाते दोनों ने परस्पर सहमति से बरेली स्थित अगस्त्य मुनि आश्रम पहुंचने का फैसला किया।

🛕 वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ विवाह, सिंदूरदान और मंगलसूत्र की निभाई गई रस्म

बरेली के अगस्त्य मुनि आश्रम पहुंचने पर आश्रम के प्रमुख पंडित के.के. शंखधार ने दोनों के शैक्षणिक दस्तावेजों, आधार कार्ड तथा आयु प्रमाण पत्रों की गहनता से वैधानिक जांच की, जिसमें दोनों पूर्णतः बालिग पाए गए।

प्रतीक्षा की व्यक्तिगत इच्छा पर सनातन परंपरा के अनुसार शुद्धिकरण, सिंदूरदान, मंगलसूत्र धारण और सात फेरों की धार्मिक रस्में विधि-विधान से पूर्ण कराई गईं।

📜 आश्रम में कराया गया 251वां विवाह, पंडित के.के. शंखधार बोले— “नियमों के तहत कराई जाती है शादी”

आश्रम प्रमुख पंडित के.के. शंखधार ने बताया कि यह उनके अगस्त्य मुनि आश्रम में संपन्न कराया गया 251वां सफल विवाह है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके आश्रम में केवल उन्हीं जोड़ों का विवाह कराया जाता है जो कानूनी रूप से बालिग होते हैं तथा बिना किसी दबाव या भय के, अपनी स्वतंत्र इच्छा व स्वेच्छा से विवाह का निर्णय लेते हैं। सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही आश्रम में विवाह की धार्मिक रस्में कराई जाती हैं।

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