प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को ‘मानवता का विश्वास’ बताते हुए कहा कि दुनिया को आर्थिक अस्थिरता, आतंकवाद एवं मजहबी उन्माद तथा जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों से बचाने के लिए बुद्ध के मार्ग पर चलना होगा। पीएम मोदी ने यहां शुरू हुए दो दिवसीय वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए यह बात कही
प्रधानमंत्री ने कहा कि बुद्ध का मार्ग भविष्य का मार्ग है, निरंतरता का मार्ग है। अगर विश्व, बुद्ध की सीखों पर चला होता, तो जलवायु परिवर्तन जैसा संकट भी हमारे सामने नहीं आता। ये संकट इसलिए आया क्योंकि पिछली शताब्दी में कुछ देशों ने दूसरों के बारे में, आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचना ही बंद कर दिया। दशकों तक वो ये सोचते रहे कि प्रकृति से इस छेड़छाड़ का प्रभाव उनके ऊपर नहीं आएगा। वो देश इसे दूसरों के ऊपर ही डालते रहे। लेकिन भगवान बुद्ध ने धम्मपद में स्पष्ट रूप से कहा है कि जैसे बूंद-बूंद पानी से घड़ा भर जाता है, वैसे ही लगातार की हुई गलतियां विनाश का कारण बन जाती हैं।
कार्यक्रम में केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरण रिजिजू, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी, संस्कृति एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, संस्कृति एवं विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी, अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महासचिव, देश-विदेश से आए बौद्ध भिक्षु शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आज का ये समय इस सदी का सबसे चुनौतीपूर्ण समय है। आज एक ओर, महीनों से दो देशों में युद्ध चल रहा है, तो वहीं दुनिया आर्थिक अस्थिरता से भी गुजर रही है।
दुनिया के सामने कईं चुनौतियां
आतंकवाद और मजहबी उन्माद जैसे खतरे मानवता की आत्मा पर प्रहार कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौती पूरी मानवता के अस्तित्व पर आफत बनकर मंडरा रही है। ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं, पारिस्थितिकीय तंत्र नष्ट हो रही है, प्रजातियां विलुप्त हो रहीं हैं। लेकिन इस सबके बीच, हमारे आप जैसे करोड़ों लोग भी हैं जिन्हें बुद्ध में आस्था है, जीव मात्र के कल्याण में विश्वास है। ये उम्मीद, ये विश्वास ही इस धरती की सबसे बड़ी ताकत है। जब ये उम्मीद एकजुट होगी, तो बुद्ध का धम्म विश्व की धारणा बन जाएगा, बुद्ध का बोध मानवता का विश्वास बन जाएगा।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन की शुरूआत करते हुए वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन आने वाले अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि बुद्ध की इस धरती की परंपरा है- ‘अतिथि देवो भव:’! अर्थात, अतिथि हमारे लिए देवता के समान होते हैं। लेकिन, भगवान बुद्ध के विचारों को जीने वाले इतने व्यक्तित्व जब हमारे सामने हों, तो साक्षात् बुद्ध की उपस्थिति का अहसास होता है। क्योंकि, बुद्ध व्यक्ति से आगे बढ़कर एक बोध हैं। बुद्ध स्वरूप से आगे बढ़कर एक सोच हैं। बुद्ध चित्रण से आगे बढ़कर एक चेतना है और बुद्ध की ये चेतना चिरंतर है, निरंतर है। ये सोच शाश्वत है। ये बोध अविस्मरणीय है।