धर्म परिवर्तन करने वालों पर भी होता है दलितों जैसा भेदभाव, आंखें नहीं बंद कर सकते’ SC ने स्वीकार की आरक्षण की मांग को लेकर लगाई गई याचिका
नई दिल्ली: धर्म परिवर्तन कर मुसलमान या ईसाई बने लोगों को आरक्षण का लाभ दिए जाने की मांग को लेकर लगाई गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है और इस मामले में कोर्ट सुनवाई करेगी। बता दें कि सिर्फ मुसलमान और ईसाई ही नहीं बल्कि सिख और बौद्ध अपनाने वालों की भी यही डिमांड है। मामले में अगली सुनवाई बुधवार को होगी। याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि मतांतरण के बाद भी सामाजिक भेदभाव जारी रह सकता है। ऐसे में हम संवैधानिक मामले को लेकर अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते।
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ‘धार्मिक और सामाजिक भेदभाव अलग-अलग चीजें हैं। मैं किसी अलग मकसद से दूसरे धर्म में जा सकता हूं। लेकिन उसके बाद भी यदि सामाजिक भेदभाव जारी रहता है तो फिर अनुसूचित जाति के आरक्षण की बात आती है। ऐसे में अदालत इस बात पर विचार क्यों नहीं कर सकती कि इन लोगों को अलग से आरक्षण दिया जाए या नहीं। जमीनी स्तर पर धर्मांतरण के बाद भी भेदभाव हो सकता है। इसलिए हम ऐसे जरूरी संवैधानिक मसले पर अपनी आंखें बंद नहीं रख सकते।’
वहीं केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे अडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट में सभी पहलुओं पर विचार नहीं किया गया था। जिसके आधार पर मतांतरित दलितों को भी आरक्षण देने की मांग हो रही है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ‘यह रिपोर्ट उतने भी अनमने ढंग से तैयार नहीं की गई है, जितना आप कह रहे हैं। आपको पूरी रिपोर्ट को एक बार फिर से पढ़ना चाहिए। आप उस रिपोर्ट के बारे में बेहद सामान्यीकरण वाला बयान दे रहे हैं।’