मध्य प्रदेश के दमोह जिले में स्थित ऐतिहासिक और आस्था के प्रमुख केंद्र मां बड़ी देवी मंदिर का इतिहास बेहद रोचक और अनोखा है। यूं तो यहां सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान पूरे जिले से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के कटेहरा गांव का प्रतिष्ठित हजारी परिवार ब्रिटिश काल के दौरान अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त होकर अपना गांव छोड़ने पर मजबूर हो गया था। परिवार की सबसे वरिष्ठ मुखिया हजारन बहू अपने पति और परिजनों के साथ दमोह के सिटी इलाके में आकर बस गईं और अपने साथ अपनी कुलदेवी मां लक्ष्मी को भी ले आईं।
👁️ सपनों के आदेश पर खेत में हुई थी स्थापना: बंद कर दी गई थी प्राचीन जीभ चढ़ाने की परंपरा
किंवदंतियों के अनुसार, हजारन बहू को माता ने स्वप्न में आकर आदेश दिया कि घर में स्थान छोटा पड़ रहा है, इसलिए उन्हें किसी बड़े और खुले स्थान पर स्थापित किया जाए। इसके बाद हजारी दम्पति ने वर्तमान मंदिर वाली जगह पर स्थित एक खेत में माता की स्थापना की। इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि शुरुआती समय में अष्टमी के दिन परिवार के सदस्य द्वारा माता को जीभ काटकर अर्पित करने की प्रथा थी, जिसे मां के आदेश और एक चमत्कारिक घटना के बाद हमेशा के लिए बंद करवा दिया गया। परिवार के सदस्य अखिलेश हजारी बताते हैं कि एक बार परंपरा न मानने पर जब दोबारा बलि दी गई, तो मंदिर के कपाट अपने आप बंद हो गए थे जो 24 घंटे बाद ही खुले।
🐘 मां के दरबार में अहंकार करने वालों का हुआ मान-मर्दन: महुआ के पेड़ के नीचे हुआ था मंदिर का निर्माण
मूल मंदिर वर्तमान स्थल के ठीक पीछे स्थित एक विशाल 300 वर्ष पुराने महुआ के पेड़ के नीचे था, जिसका निर्माण हजारी परिवार के साथ आए एक स्थानीय ठाकुर परिवार ने करवाया था। किंवदंती है कि जब ठाकुर परिवार का एक मुखिया अपनी संपन्नता के अहंकार में हाथी पर सवार होकर मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँच गया, तो अचानक मंदिर का पिछلا हिस्सा भरभरा कर गिर गया। अपनी भूल का अहसास होने पर उन्होंने क्षमा याचना की। मंदिर के पुजारी आशीष दत्त कटारे बताते हैं कि कभी गांव जैसी स्थिति वाले दमोह में स्थापित हुई यह कुलदेवी धीरे-धीरे पूरे नगर की ‘खेर माता’ के रूप में पूजी जाने लगीं, जहाँ सच्चे मन से आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है।