दिल्ली में ‘D-M’का न मिलता साथ तो AAP हो जाती पूरी तरह साफ, बीजेपी क्यों नहीं खत्म कर पाई वर्चस्व?

दिल्ली की सियासत में एक दशक से बरगद की तरह जड़े जमाए रखने वाली आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव में करारी मात खानी पड़ी है. 2015 और 2020 में क्लीन स्वीप करने वाली आम आदमी पार्टी 22 सीटों पर सिमट गई जबकि बीजेपी 48 सीटों के साथ सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही. अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित AAP के तमाम दिग्गज नेता चारों खाने चित हो गए हैं. दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी को डीएम (दलित-मुस्लिम) वोटबैंक का साथ नहीं मिलता तो पूरी तरह से साफ हो जाती.

दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में से इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी सिर्फ 22 सीटें ही जीतने में सफल रही है. AAP के जीतकर आए 22 विधायकों में 4 मुस्लिम और 8 दलित समुदाय के विधायक हैं. इस तरह आधे से ज्यादा विधायक दलित-मुस्लिम हैं. दिल्ली के चुनावी नतीजों का विश्लेषण करते हैं तो आम आदमी पार्टी भले ही चुनाव हार गई है और बीजेपी सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही हो, लेकिन दलित-मुस्लिम बहुल सीटों पर केजरीवाल के सियासी वर्चस्व बीजेपी तोड़ नहीं सकी है.

दलित सीटों पर AAP के जीत का स्ट्राइक रेट

दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को भले ही भारी हार का सामना करना पड़ा है. कुल 70 सीटों पर AAP के जीत का स्ट्राइक रेट 31.4 फीसदी रहा है, लेकिन दलित आरक्षित सीटों पर उसकी सफलता की दर 66 फीसदी थी. दिल्ली की 12 दलित आरक्षित सीटों में से बीजेपी को चार और आम आदमी पार्टी को आठ सीटें मिली हैं. 2013 में आम आदमी पार्टी ने इन 12 आरक्षित सीटों में 9 सीटें जीती थीं तो 2015 और 2020 में सभी सीटें आम आदमी पार्टी जीतने में सफल रही है.

दिल्ली विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों में से चार- बवाना, मंगोलपुरी, मादीपुर और त्रिलोकपुरी बीजेपी के खाते में गई हैं. वहीं, आठ दलित आरक्षित सीटों पर आम आदमी पार्टी जीती है, जिसमें सुल्तानपुर माजरा, करोल बाग, पटेल नगर, देवली, अंबेडकर नगर, कोंडली, सीमापुरी और गोकुलपुर पर सीट शामिल हैं. इन सभी सीटों पर दलित और बहुजन की पार्टी मानी जाने वाली बीएसपी को कोई खास सफलता नहीं मिली. लेकिन इनमें दो सीटें ऐसी थीं जहां आप की हार का अंतर कांग्रेस को मिले वोटों से अधिक था, जैसे- मादीपुर और त्रिलोकपुरी

मुस्लिम सीटों पर AAP के जीत का स्ट्राइक रेट

मुस्लिम विधानसभा सीटों पर जीत का स्ट्राइक रेट देखें तो आम आदमी पार्टी का 80 फीसदी रही है. आम आदमी पार्टी ने पांच मुस्लिम समुदाय के नेताओं को टिकट दिया था, जिसमें से चार जीतने में कामयाब रहे. ओखला, सीलमपुर, मटिया महल और बल्लीमरान सीट आम आदमी पार्टी जीतने में कामयाब रही तो मुस्तफाबाद सीट बीजेपी जीतने में सफल रही है. चारों ही मुस्लिम विधायक आम आदमी पार्टी से जीते हैं जबकि, मुस्तफाबाद सीट उसकी पकड़ से बाहर निकल गई है. 2020 में सभी पांचों मुस्लिम सीटें केजरीवाल की पार्टी जीतने में कामयाब रही. 2015 में आम आदमी पार्टी ने चार मुस्लिम सीटें जीती थी. बीजेपी ने इस बार किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था.

दिल्ली में 13 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिनमें से सात सीटों पर मुस्लिम जीतने या फिर जिताने की ताकत रखते हैं. मुस्लिम बहुल सातों सीटों में से छह विधानसभा सीटें आम आदमी पार्टी जीती हैं और एक सीट मुस्तफाबाद बीजेपी जीत सकी है. ओखला, सीलमपुर, मटिया महल और बल्लीमरान पर AAP के मुस्लिम विधायक जीते हैं. इसके अलावा बाबरपुर और चांदनी चौक में मुस्लिम मतदाताओं के दम पर ही आम आदमी पार्टी जीतने में सफल रही है.

मुस्तफाबाद सीट भले ही AAP हार गई हो, लेकिन दूसरे नंबर पर रही. ऐसे ही मुस्लिम बहुल माने जाने वाली जंगपुर सीट पर बहुत मामूली वोटों से उसे हार का मूंह देखना पड़ा है. इन सीटों पर मुस्लिम वोटों के बिखराव के चलते आम आदमी पार्टी हारी है. मुस्लिम समुदाय ने आम आदमी पार्टी को झोली भरकर वोट दिए हैं, जहां पर AAP के मुस्लिम प्रत्याशी थे, उन पर दिया ही और जहां पर मुस्लिम कैंडिडेट नहीं थे, वहां पर भी अच्छा खासा दिया.

डीएम का न मिलता साथ तो हो जाती साफ

दिल्ली विधानसभा चुनाव में दलित और मुस्लिम मतों का साथ आम आदमी पार्टी को नहीं मिलता तो ये पूरी तरह साफ हो जाती. आम आदमी पार्टी के 22 विधायकों में से 14 विधायक दलित-मुस्लिम वोटों के सहारे जीतकर आए हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि दलित-मुस्लिम सीटों पर AAP का बेहतर प्रदर्शन दिखाता है कि निम्न मध्यवर्ग में आम आदमी पार्टी सरकार की कल्याणकारी स्कीमों का असर कम से कम अभी तक फीका नहीं पड़ा है.

इसके अलावा दलितों ने ही कांग्रेस और न ही बसपा को तरजीह दी. इसी तरह मुस्लमानों ने न ही कांग्रेस को बहुत ज्यादा अहमियत दिया और न ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ मजबूती से खड़े नजर आए. मुस्लिम और दलित अगर आम आदमी पार्टी का साथ छोड़ देता तो फिर आम आदमी पार्टी सिंगल डिजिट में सीमित हो जाती.

दलित-मुस्लिम सीटें बीजेपी के लिए चुनौती

दिल्ली की सियासत में 17 फीसदी दलित मतदाता हैं और 13 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इस तरह दलित और मुस्लिम काफी अहम रोल में है, लेकिन बीजेपी इन दोनों ही समुदाय का विश्वास नहीं जीत सकी है. हालांकि, बीजेपी के सियासी एजेंडे में मुस्लिम शामिल नहीं है, लेकिन दलितों पर उसका खास फोकस रहा है. इसके बाद भी दलित और मुस्लिम दोनों ही दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ खड़े नजर आते हैं.

दिल्ली में मुस्लिम वोटिंग पैटर्न देखें तो बीजेपी विरोध का रहा है, जिसके चलते मुस्लिम समाज बीजेपी को हराने वाली पार्टी के पक्ष में रहते हैं. इसके चलते ही बीजेपी मुस्लिमों का विश्वास नहीं जीती पाती, लेकिन आम आदमी पार्टी को भी सियासी मजबूरी में मुस्लिमों ने वोट दिया है. कांग्रेस जीतने वाली स्थिति में नहीं दिख रही थी, जिसके चलते मुस्लिमों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. ऐसे ही दलित वोटिंग पैटर्न देखें तो केजरीवाल की फ्री बिजली, पानी, शिक्षा जैसी योजनाएं आम आदमी पार्टी के लिए सियासी मुफीद रही थी. बीजेपी दलितों का विश्वास नहीं जीत सकी और उसका फोकस मध्य वर्ग पर रहा.

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