कहीं ‘आया राम गया राम’ के चक्कर में BJP का न हो जाए ‘बंटाधार’

जालंधर: पंजाब में खुद को मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ समय से दूसरे राजनीतिक दल, जिनकी नीतियों का वह विरोध करती रही है, के लोगों को अपने खेमे में शामिल कर रही है। यह सिलसिला काफी देर से चल रहा है, जिसके कारण पार्टी में लोगों के इंपोर्ट होने का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन बाहरी लोगों के पार्टी में शामिल होने के बाद इस समय भाजपा में एक अजीब सी स्थिति बन गई है। जहां बाहरी लोगों को ज्यादा वैल्यू दिए जाने से पार्टी के अपने नेता नाराज हैं, वहीं बाहरी लोग भी अब भाजपा की अनुशासनात्मक नीतियों को लेकर परेशान दिख रहे हैं।

गैरों पे करम
पिछले करीब एक साल से कांग्रेस अकाली दल से करीब दो दर्जन छोटे-बड़े नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। इनके भाजपा में आने के बाद इनका तहेदिल से स्वागत किया गया। मानो जैसे पार्टी को कोई नायाब हीरे मिल गए हों। इन हीरों की चमक पार्टी को अपने वर्कर से भी ज्यादा लगी और इन्हें सिर आंखों पर बिठाया गया, लेकिन अब पार्टी में लगातार स्थिति बदल रही है। बाहर से पार्टी में आए नेता अब घुटन महसूस करने लगे हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि भाजपा तथा कांग्रेस व अकाली दल जैसे राजनीतिक दलों के कल्चर में काफी फर्क है। भाजपा में जहां अनुशासन को अहमियत दी जाती है, वहीं बाकी दलों में अनुशासन का कोई खास बोलबाला नहीं है। खुले माहौल में रहे दूसरे राजनीतिक दलों के नेता अब भाजपा में खुद को कमफर्टेबल महसूस नहीं कर रहे। यह भी हो सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में भाजपा से रुख्सत हो जाएं। उस स्थिति में पार्टी की स्थिति क्या रहेगी, यह सोचने वाली बात है।

अपनों पे सितम
कुछ ऐसी ही स्थिति भाजपा में वर्षों से दरियां बिछाने से लेकर नेताओं को चाय-पानी पिलाने का काम करने वाले वर्करों की भी है। बाहर से आए नेताओं को इनसे भी ज्यादा वैल्यू दी गई, इन्हें सामने कुर्सियों पर बिठाया गया और बाहर से आए नेताओं को मंच पर सुशोभित किया जाता रहा। चंद दिन पहले पार्टी में आए लोगों को अत्याधुनिक ‘स्फिस्टीकेटिड’ हथियारों से लैस जवान सुरक्षा के तौर पर प्रदान किए गए, जबकि पार्टी के जो वर्कर वर्षों से काम कर रहे थे, उन्हें कुछ नहीं मिला। पार्टी के अंदर ही इन दो तरह की नीतियों ने वर्कर का मनोबल तोड़ दिया है और स्थिति यह है कि खुद की पार्टी का वर्कर ही अब घुटन महसूस करने लगा है। कहीं ऐसा न हो कि दूसरे दलों से आए लोग अपने न हों और ऊपर से भी अपने भी बेगाने हो जाएं।

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