BJP का परमानंद तेता,ब्रम्हानंद जैसे चेहरों पर दांव मगर 5 में से 3 चुनाव कांग्रेस ने जीते

रायपुर: छत्तीसगढ़ में सियासत का सेमीफाइनल शुरू हो चुका है। कांग्रेस खुद को आदिवासियों का हितैशी बताकर शासन चला रही है। भाजपा आदिवासियों के लिए लड़ने का माद्दा लेकर प्रदेश का सबसे बड़ा विपक्षी दल है। आदिवासियों के इलाके में चुनाव है अब इस बार भारतीय जनता पार्टी के सामने भानुप्रतापपुर उप चुनाव 2022 में कमल खिलाने की चुनौती है।ये चुनौती जनाधार और प्रत्याशियों के चयन पर भी निर्भर है। भानुप्रतापपुर में भाजपा का चेहरा कौन होगा। इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। मगर इस रिपोर्ट में पढ़िए वो नाम जिन्हें पार्टी टिकट देकर चुनावी रण में जीत की आशा से उतार सकती है। भानुप्रतापपुर कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। प्रदेश के गठन के बाद से अब तक हुए 5 चुनावों में से तीन मनोज मंडावी ने ही जीते। उनके निधन के बाद ये सीट खाली है।परमानंद तेता ने हाल ही में अजय जाम्वाल से भी मुलाकात की।भाजपा के दावेदारइस बार के चुनावों में सबसे तेज एक नाम उभरकर आया है वो है परमानंद तेता का। तेता भानुप्रतापपुर की राजनीति में पिछले कुछ सालों से सक्रिय हैं। पेशे से इंजीनियर तेता NMDC में मकैनिकल मैनेजर रह चुके हैं। साफ और एजुकेटेड छवि की वजह से इनका नाम दावेदारों की लिस्ट में सबसे ऊपर है। माना जा रहा है कि इस भाजपा नई रणनितियां लगाकर पूरे प्रदेश में काम कर रही है। रेस में इससे पहले इसी इलाके से विधायक रह चुके ब्रम्हानंद नेताम और देवलाल दुग्गा भी हैं। मगर भाजपा में बदलाव की लहर के चलते इनपर दांव शायद संगठन न लगाए।भाजपा के ब्रम्हानंद 2008 में भानुप्रतापपुर विधायक थे।ब्रम्हानंद नेताम साल भानुप्रतापपुर से साल 2008 में विधायक रह चुके हैं। मनोज मंडावी को एक बार हरा चुके हैं। इनका नाम भी इस इलाके से चर्चा में है। आदिवासी संगठनों में इनकी पैठ अच्छी मानी जाती है। इस बार भाजपा आदिवासी आरक्षण के मुद्दे के साथ चुनाव में है। नेताम की समाज में पैठ का फायदा भाजपा को मिल सकता है।देवलाल दुग्गा को पिछली बार भी भाजपा प्रत्याशी बना चुकी है।देव लाल दुग्गा का दम साल 2003 में दिखा था। ये भी कांग्रेस के मनोज मंडावी को हराकर विधानसभा पहुंचे थे। दुग्गा का सियासी करियर 1977 में भाजपा से जुड़ने के साथ शुरू हुआ था। पेशे से किसान दुग्गा भानुप्रतापपुर के अनुभवी नेता हैं। पिछली बार 2018 के चुनाव में दुग्गा को भाजपा अपना प्रत्याशी बना चुकी है तब कांग्रेस से मनोज सिंह मांडवी ने देवलाल दुग्गा को सिर्फ 27 वोटों के मार्जिन से हराया था।पूर्व मंत्री लता उसेंडी की बहन किरण भानुप्रतापुर में सियासी रूप से सक्रिय हैं।ये नाम भी चर्चा मेंभाजपा नेता सतिश लाठिया, गौतम उइके – भाजपा जिला उपाध्यक्ष कांकेर, हेमेंद्र (बंटी)ठाकुर – युवा मोर्चा, पूर्व मंत्री लता उसेंडी की बहन किरण नरेटी और रुक्मणी उइके ये वो नाम हैं जिनपर भाजपा की नजर है। पार्टी सूत्रों की मानें तो जल्द ही भानुप्रतापपुर में भाजपा के सियासी प्रताप को बढ़ाने वाले प्रत्याशी का एलान हो जाएगा। कांग्रेस की तरफ से मनोज मंडावी की पत्नी को ही चुनाव लड़ाए जाने की तैयारी है।जिसकी सरकार उप चुनाव में जीत उसकीराज्य स्थापना के बाद से प्रदेश में करीब 11 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव हुए हैं। इतिहास रहा है कि लोगों ने उप चुनावों में उसे ही विधायक बनाया जिसकी पार्टी की सरकार रही। जानकारों के मुताबिक इनमें से केवल एक सीट कोटा को छोड़कर बाकी सभी सीटों ऐसा ही हुआ। राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद के निधन की वजह से खाली हुई कोटा सीट पर जब उपचुनाव हुआ तब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। इसके बावजूद वहां से कांग्रेस की ड. रेणु जोगी जीती थीं।कांग्रेस शासन में हुए उप चुनावों में नहीं खुला भाजपा का खातासाल 2018 में दंतेवाड़ा की सीट से भाजपा के भीमा मंडावी ने चुनाव जीता। मंडावी नक्सल हमले में मारे गए सितंबर 2019 में उप चुनाव हुआ। यहां दिग्गज कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को जीत मिली। ये सीट अब कांग्रेस के पास है।साल 2019 में चित्रकोट में उपचुनाव हुए। क्योंकि यहां से कांग्रेस के चुने विधायक दीपक बैज को लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना पड़ा वो जीत गए ये सीट खाली हुई तो कांग्रेस के ही राजमन बेंजाम ने उप चुनाव जीता और विधायक बने।साल 2020 नवंबर में मरवाही में उप चुनाव हुए। यहां से विधायक रहे छत्तीसगढ़ के पहले सीएम अजीत जोगी की मौत के बाद जनता कांग्रेस से ये सीट कांग्रेस पास चली गई। कांग्रेस से केके ध्रुव को मौका मिला जीत गए। इसी साल 2022 में खैरागढ़ इस सीट से जकांछ के विधायक देवव्रत सिंह के निधन के बाद उप चुनाव हुआ कांग्रेस की यशोदा निलाम्बर वर्मा जीत गईं।

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