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 द्वापर युग के अंत में महाभारत का युद्ध हुआ था. ये युद्ध पांडवों और कौरवों के बीच लड़ा गया था. महाभारत का युद्ध आज 5000 साल बाद भी सबसे बड़ा और भयानक युद्ध माना जाता है. महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध था, जिसमें अंत में विजय धर्म यानी पांडवों की हुई थी. महाभारत का युद्ध दुर्योधन के अहंकार का परिणाम था. वो पांडवों को उनका हिस्सा नहीं देना चाहता था.

दुर्योधन हमेशा से पांडवों से युद्ध ही चाहता था. क्योंकि उसे भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, अपने मित्र कर्ण, कृपाचार्य और अश्वत्थामा की ताकत का घमंड था. उसे लगता था कि संसार की कोई भी सेना इन महारथियों का सामना करने के लिए आगे नहीं आएगी. फिर कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों की सेना आमने-सामने आई. कौरवों की सेना पांडवों से बड़ी थी, लेकिन दुर्योधन फिर भी डर गया था.

कौरवों के पास 11 तो पांडवों के पास थी 7 अक्षौहिणी सेना

महाभारत युद्ध में कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी, जबकि पांडवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना थी. जाहिर है कौरवों की सेना पांडवों से काफी बड़ी थी. ऊपर से भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महारथी योद्धा कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ रहे थे. पांडवों की ओर भी महारथियों की कमी थी और सबसे बड़ी बात की भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इस युद्ध में अर्जुन के सारथी थे. धर्म पांडवों की ओर था.

दुर्योधन के डर के बहुत से थे कारण

पांडवों से बड़ी सेना होने के बावजूद दुर्योधन इसलिए डर गया था, क्योंकि उसको अर्जुन के पराक्रम के भय था. साथ ही वो ये भी जानता था कि भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य जैसे महाराथी जो उसकी ओर से युद्ध लड़ रहे हैं, वो विजय के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए लड़ रहे हैं. दुर्योधन को ये भी ज्ञात था कि पांडवों के साथ श्रीकृष्ण हैं और उनकी व अर्जुन की जोड़ी के आगे कोई भी विशाल सेना टिक नहीं सकती.

महाभारत के युद्ध में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन का क्रोध बहुत प्रचंड हो चुका था. अर्जुन के क्रोध को देखकर भी दुर्योधन डर गया था.

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