ईरान और इजराइल पर कितना निर्भर है भारत, नहीं रुका वॉर तो इंडिया को होगा ये नुकसान

ईरान-इजराइल का महासंग्राम एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है. हफ्ते की शुरुआत में ही इजराइल पर ईरान के हमले से मिडिल ईस्ट में टेंशन बढ़ गई है. दोनों से ही भारत के अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं. तनाव बढ़ने पर भारत ने चिंता जाहिर की है. इसमें इजाफा बाजार को भी डरा सकता है. ईरान और इजराइल पर भारत की निर्भरता भी काफी है.

ऐसे में भारत बिल्कुल नहीं चाहता कि उसके दो दोस्त आपस में भिड़ जाएं. आइए जानते हैं अगर ये वॉर नहीं रुकता है या टेंशन बढ़ती है तो भारत को क्या नुकसान होगा. सबसे पहले आइए जानते हैं इजराइल से भारत के रिश्ते कैसे हैं और कितना कारोबार दोनों के बीच बीते सालों में हुआ है…

चार सालों में ट्रेड बढ़ा

भारत ने 1992 में इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए थे. तब से दोनों देशों के बीच ट्रेड काफी बढ़ा है. यह 1992 में लगभग 20 करोड़ डॉलर (खासतौर पर डायमंड) से बढ़कर FY 2022-23 में 10.7 अरब डॉलर (डिफेंस को छोड़कर) हो गया है. पिछले चार सालों में यह बढ़ोतरी तेज हुई है. इस दौरान व्यापार दोगुना हो गया. 2018-19 में 5.56 अरब डॉलर से 2022-23 में यह बढ़कर 10.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया. 2021-22 और 2022-23 के बीच व्यापार में 36.90 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. यह 7.87 अरब डॉलर से 10.77 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

वित्त वर्ष 2023-24 में पहले 10 महीनों (अप्रैल-जनवरी) के दौरान भारत-इजराइल द्विपक्षीय व्यापार 5.75 अरब डॉलर तक पहुंच गया. वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान भारत के 1,167 अरब डॉलर के कुल व्यापार का 0.92 फीसदी हिस्सा इजराइल का था. इस तरह वह भारत का 32वां सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन गया. विदेश मंत्रालय (एमईए) के अनुसार, भारत एशिया में इजराइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है. विश्व स्तर पर सातवां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.

इजराइल-भारत में क्या होता है लेन-देन?

भारत से इजराइल को निर्यात की जाने वाली सबसे मूल्यवान वस्तुओं में डीजल, हीरे, विमानन टरबाइन ईंधन, रडार उपकरण, बासमती चावल, टी-शर्ट और गेहूं शामिल हैं. 2022-23 के दौरान कुल निर्यात में दो वस्तुओं डीजल और हीरे का हिस्सा 78 फीसदी था. वहीं, भारत ने अंतरिक्ष उपकरण, पोटेशियम क्लोराइड, मेकैनिकल एप्लायंस, थ्रस्ट के टर्बो जेट और प्रिंटेड सर्किट जैसी वस्तुओं का आयात किया. .

ईरान के साथ कैसे हैं भारत के रिश्ते?

जहां एक तरफ भारत इजराइल का कारोबार बीते सालों में बढ़ा है वहीं दूसरी तरफ पिछले पांच साल में भारत-ईरान व्यापार का मूल्य कम हो गया है. वित्त वर्ष 2022-23 में ईरान भारत का 59वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था. उसके साथ द्विपक्षीय व्यापार 2.33 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. वित्त वर्ष 2022-23 में बढ़ोतरी से पहले ईरान के साथ भारत के व्यापार में कॉन्ट्रैक्शन देखा गया है. इसमें 2021-22 में 21.77 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी. यह 1.94 अरब डॉलर से बढ़कर 2022-23 में 2.33 अरब डॉलर हो गया था.

हालांकि, इसके पिछले तीन वर्षों (2019-20, 2020-21 और 2021-22) में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के मद्देनजर साल-दर-साल 9.10 फीसदी से 72 फीसदी तक कॉन्ट्रैक्शन देखने को मिला. ईरान के साथ व्यापार भी 2018-19 में 17 अरब डॉलर के ऊंचे स्तर से घटकर 2019-20 में 4.77 अरब डॉलर और 2020-21 में 2.11 अरब डॉलर रह गया.

क्या होता है ईरान भारत के बीच ट्रेड?

2022-23 में 2.33 अरब डॉलर के व्यापार में से ईरान को भारत का निर्यात 1.66 अरब डॉलर था. जबकि ईरान से भारत का आयात सिर्फ 0.67 अरब डॉलर था. वित्त वर्ष 2023-24 के पहले 10 महीनों (अप्रैल-जनवरी) के दौरान ईरान के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 1.52 अरब डॉलर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान द्विपक्षीय व्यापार भारत के कुल व्यापार का 0.20 फीसदी था. भारत ईरान को मुख्य रूप से कृषि वस्तुओं और पशुधन उत्पादों का निर्यात करता है. इनमें मीट, स्किम्ड मिल्क, छाछ, घी, प्याज, लहसुन और डिब्बाबंद सब्जियां शामिल हैं. वहीं, भारत ने ईरान से मिथाइल अल्कोहल, पेट्रोलियम बिटुमेन, लिक्विफाइड ब्यूटेन, सेब, लिक्विफाइड प्रोपेन, खजूर और बादाम का आयात किया.

भारत को क्या होगा नुकसान?

ईरान के मिसाइल अटैक के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. इस खबर के आने के बाद खाड़ी देशों का कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड ऑयल और अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई की कीमतों में 4 फीसदी से ज्यादा तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम 74 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए हैं. दोनों देशों के बीच टेंशन का असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर होगा.

कच्चे तेल में तेजी से ऑयल एक्सप्लोरेशन कंपनी जैसे- ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के शेयरों में तेजी आने की संभावना है. वहीं, पेंट और टायर शेयरों में गिरावट देखने को मिल सकती है. क्योंकि, इन कंपनियों की निर्भरता क्रूड पर होती है. ऐसे में क्रूड महंगा हुआ तो इन कंपनियों की इनपुट कॉस्ट बढ़ सकती है.

बाजार पर असर

इस जियोपॉलिटिकल टेंशन का असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिल रहा है. निफ्टी और डाओ फ्यूचर्स समेत कुछ देशों के मार्केट लाल निशान के साथ कारोबार कर रहे हैं. अगर यह जंग और बढ़ी तो कच्चे तेल में बढ़ोतरी से कई चीजें महंगी हो सकती हैं. वहीं, शेयर बाजार में ऑयल स्पेसिफिक स्टॉक पर तगड़ा असर देखने को मिल सकता है.

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