खरखरे की सदारत में तीन सौ साल बाद बड़े साहब की हुुई तामिरी हजारों श्रद्धालुओं में आकर्षण का केंद्र बने बड़े साहब
शाजापुर। एशिया के सबसे बड़े दुलदुल का पांच महीने में नवीनीकरण का कार्य पूरा हुआ और अब मोहर्रम की 1 तारीख को बड़े साहब को इमाम बाड़ा ले जाया जाएगा। शोहदा-ए- कर्बला की याद में तीन सौ साल पहले सय्यद मिया मीर घासी के द्वारा बड़े साहब की तामिरी करवाई गई थी, उस समय इमारत को सागी की बल्लियों, किमचियों सहित अन्य उपकरण लगा कर तैयार किया गया था। वहीं पैतालीस साल पूर्व बड़े साहब की रिपेरिंग, डेंटिंग, पेंटिंग के रूप में जामा मस्जिद परिसर में की गई और तीन सौ साल पुरानी बड़े साहब की इमारत को मोहर्रम पर्व के जुलूस के पूर्व छोटी-मोटी रिपेरिंग कर जुलूस निकाला जाता रहा। पुरानी इमारत होने के चलते हमेशा डर का माहौल बना रहता था। ऐसे में शहर मोहर्रम कमेटी के सदर इमरान खरखरे ने हौंसला दिखाते हुए मोहर्रम कमेटी के पदाधिकारियों से बड़े साहब के पुराने स्ट्रेक्चर पर नया रूप देने की राय शुमारी कर अपनी बात रखी, जिस पर कमेटी के लोगों ने बड़े साहब की जीर्ण-शीर्ण तस्वीर को देख अपनी सहमति देकर मोहर लगाई और फैसला लिया कि बड़े साहब को अत्याधुनिक उपकरणों से तैयार कर नया रूप दिया जाएगा। इसके बाद शहर मोहर्रम कमेटी ने बड़े साहब तामिरी का ठेका 4 लाख 75 हजार रुपये में राजस्थान के ठेकेदार बाबूलाल बामनिया को दिया गया जिनके द्वारा अंदर से बाहर तक नए उपकरण लगाकर फुलवाटर प्रूफ बड़े साहब को बनाया गया है। खरखरे ने बताया कि बड़े साहब की मजबूती के लिए नए जाल पर लोहे की मजबूत पत्तियों का जाल लिया गया है जिससे बड़े साहब की इमारत बेहद मजबूत हो गई है। बड़े साहब पर लगने वाली कुट्टी में ऐसे धातु डाले गए हैं जिससे बड़े साहब बाउंस होंगे और उन्हे किसी भी अप्रिय घटना के दौरान कोई क्षति नही पहुंचेगी। इमारत पर कलर भी उच्च क्वालिटी का लगाया गया है जो लंबे अंतराल तक खराब नही होगा। ठेकेदार बामनिया के मुताबिक बड़े साहब इमारत आगामी तीन सौ सालों तक मजबूत स्थिति में बनी रहेगी।
बड़े साहब तामिरी में इनकी रही अहम भूमिका
बड़े साहब तामिरी का कार्य पांच महीनों में पूरा हुआ है। ठेकेदार के साथ निस्वार्थ आठ घण्टे की ड्यूटी कमेटी के मेम्बरों ने भी दी और छोटी-छोटी बारीकियों से ठेकेदार को अवगत कराकर बड़े साहब तामीर में अपना अहम किरदार निभाया। बड़े साहब के नव निर्माण में सच्चे सिपाही के रूप में सरपरस्त सय्यद सबदर अली, मोहर्रम कमेटी खजांची अकरम भाई, पप्पू भाई सदर, अखलाक हुसैन मदनी, ताज पहलवान, मुंशी भाई, मरगुब भाई, मंच संचालक हनीफ राही, प्रवक्ता बाबू भाई ऐरिकेशन, अकरम बाबा पेंटर, सुक्का भाई, सोकत भाई, सय्यद फैसल वारसी, शफीक पत्रकार, सद्दाम पठान, शाबाज पठान बिच्छू, कय्यूम मंसूरी, निसार लाला, सद्दाम कुरैशी, इमरान वारसी, अजहर शेख, शराफत खान, लक्की कुरैशी, पप्पू भानेज, मुर्तुजा अली, ओसामा कुरैशी, वाजिद काला, मंजू पेंटर, शम्मी खान की सराहनी भूमिका रही।
हिंदू समाज के कारीगरों ने की इमारत तामीर
बड़े साहब तामिरी में हिंदू समाज के कारीगरों ने यह बता दिया कि आस्था के सामने मजहब कोई मायने नही रखता। कला किसी धर्म जाति की मोहताज नही वह सब के लिए समान दर्जा रखती है। बड़े साहब तामिरी करने वालों में ठेकेदार बाबूलाल बामनिया, मोनू उस्ताद, अशोक भाई, राजू, कुलदीप, नैना, अंकित ने सराहनीय कार्य किया। कारीगरों ने बताया कि उन्होने पूरी आस्था के साथ बड़े साहब का नव निर्माण किया है।
समाज के वरिष्ठों का रहा सहयोग
एशिया के सबसे बड़े दुलदुल की तामीर में शहर काजी एहसानउल्लाह साहब, सरपरस्त सय्यद साजिद अली वारसी, सरपरस्त शेख शमीम शम्मू भाई, सरपरस्त मिर्जा सलीम बैग, इकबाल अहमद सिद्दीकी, इरशाद खान, असलम शाह, सय्यद अजगर अली, दाऊद सेठ, सय्यद वकार अली, हाजी मसूद साहब, अय्यूब मेव, हबीब कुरैशी, डॉक्टर मौजूद, आफताब चाचा, मिर्जा सोहराब बेग, रज्जाक भाई, शब्बीर भाई, अजीज मंसूरी, जम्मू भाई दायरा, शकील वारसी, अकील वारसी, बबलू कुरैशी, वाजिद अली शाह, अकील भाई नूरमण्डी, जूनैद वारसी, अनीस पटेल, सय्यद अनवर अली, सय्यद आबिद अली, शाकिर भाई बुशरा, मुन्ना भाई तय्या, शाकिर उर्फ नानू का सहयोग रहा।