जमीन के नक्शे में कोई कूटरचना नहीं की, इसलिए पूर्व विधायक सहित 8 लोगों को न्यायालय ने किया बरी शाजापुर का 12 साल पुराना बहुचर्चित जमीन का मामला, एमपी एमएलए कोर्ट ने दिया निर्णय

शाजापुर, 29 जनवरी. शाजापुर का सबसे चर्चित और बहुप्रतिक्षित एबी रोड जमीन मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एमपी, एमएलए स्पेशल कोर्ट ने पूर्व विधायक सहित 8 लोगों को दोषमुक्त करते हुए अपने निर्णय में लिखा कि जमीन में कोई कूटरचना नहीं हुई, इसलिए सभी अभियुक्तों को दोषमुक्त किया जाता है.
गौरतलब है कि शाजापुर में एबी रोड पर स्थित भूखंड विक्रेता अंशुल जैन, अपूर्वा जैन और पुखराज जैन ने यह भूखंड शाजापुर के पूर्व विधायक अरुण भीमावद, दीपक भीमावद, दीपक चौहान, मनोज पुरोहित, माणक तिलगोता को बेचा था. भूखंड की चर्तुसीमा को लेकर एक निजी परिवाद विघ्नसंतोषी और राजनीतिक द्वेषता के कारण ब्रह्मानंद चौधरी ने न्यायालय में दायर किया था, जिस पर न्यायालय ने विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था. क्योंकि अरुण भीमावद इस दौरान चुनाव जीतकर विधायक बन गए थे, इसलिए यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्पेशल एमपी, एमएलए कोर्ट में स्थानांतरित किया गया था. 12 साल से लगातार यह केस भोपाल स्पेशल कोर्ट के बाद इंदौर स्पेशल कोर्ट स्थानांतरित किया गया. इस मामले में परिवादी ब्रह्मानंद चौधरी की तरफ से अब्दुल रशीद अंसारी, इरशाद एहमद, नासिर अंसारी, अब्दुल वहीद अंसारी के बयान दर्ज हुए, तो वहीं शाजापुर के तत्कालीन थाना प्रभारी सलीम खान और भू अभिलेख के अखिलेश मालवीय और तत्कालीन पटवारी मुकेश वत्स और पंजीयन कार्यालय के बलराम कुंभकार के बयान दर्ज किए गए. वहीं अभियुक्तों की तरफ से बचाव पक्ष में आशीष नागर ने अपने बयान दिए. 11 साल से अधिक समय तक यह केस शाजापुर की राजनीति के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी बहुचर्चित रहा है. अधिवक्ता विकास राठी द्वारा की गई तार्किक बहस और जमीन को लेकर प्रस्तुत किए गए प्रमाणों के आधार पर न्यायालय 22वें अपर सत्र न्यायाधीश विशेष न्यायाधीश एमपी एमएलए श्री मुकेश नाथ ने 76 बिंदुओं वाले 28 पेज का निर्णय सुनाया. जिसमें माननीय न्यायाधीश ने माना कि विक्रय पत्र में गलत चर्तुसीमा उल्लेखित करना कूटरचना की श्रेणी में नही आता है बल्कि एक सिविल अपकृत्य होकर सिविल विवाद की श्रेणी में आता है. इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में ही उल्लेखित मो. इब्राहिम बाले न्याय दृष्टांत में दिए हैं. कूटरचना प्रमाणित नहीं होता है और धारा 465, 467, 468, 471, 475 अपराध के तथ्य भी आकर्षित नहीं होते हैं. अभियुक्तगणों द्वारा कूटरचना करने के किसी भी प्रकार का अपराधिक षडयंत्र किया जाना प्रकट नहीं होता है. विश्लेषण के आधार पर अभियोजन अभियुक्तगण के विरूद्ध धारा 420, 465, 467, 468, 471, 475, 120 बी के अपराध प्रमाणित करने में असफल रहा. इस कारण सभी अभियुक्तगणों को सभी धाराओं में दोषमुक्त किया जाता है.
परिवादी ने जो आरोप लगाया था, वो न्यायालय में नहीं हुआ सिद्ध
एबी रोड पर विक्रय की गई जमीन को लेकर परिवादी ब्रह्मानंद चौधरी ने निजी परिवाद न्यायालय में लगाया था, जिसमें उन्होंने कूटरचना कर पीछे की जमीन को आगे बताकर जमीन खरीदी है, इसे लेकर न्यायालय में परिवाद विभिन्न धाराओं में दर्ज कराया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्पेशल एमपी एमएलए कोर्ट में ब्रह्मानंद चौधरी के आरोप न्यायालय में सिद्ध नहीं कर पाए और न्यायालय ने विक्रेता-क्रेता सहित सभी 8 अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया. शाजापुर का सबसे चर्चित यह जमीन का मामला प्रदेश स्तर पर भी काफी चर्चित रहा है. क्योंकि राजनीतिक द्वेषता के कारण यह परिवाद दायर किया गया था, लेकिन आखिर में न्यायालय में सभी को न्याय मिला.
अपराधिक नहीं सिविल का था मामला…
एमपी एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश श्री मुकेश नाथ ने अपने निर्णय में बिंदू क्रमांक 70 में स्पष्ट आदेशित किया है कि यह मामला गलत चर्तुसीमा का था और चर्तुसीमा उल्लेखित करना कूटरचना की श्रेणी में नहीं आता है, बल्कि यह सिविल विवाद की श्रेणी में आता है. माननीय न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश ने बिंदू क्रमांक 69 में यह उल्लेख किया है कि अभियुक्तगणों ने आज दिनांक तक उस भूमि पर कोई आधिपत्य प्राप्त नहीं किया है और ना ही परिवादी या अन्य किसी व्यक्ति से आधिपत्य प्राप्त करने का प्रयास किया है. परिवादी एवं अन्य साक्षीगण उनके निर्धारित भूखंडपर शुरू से आज तक काबिज हैं और उनके कब्जे में कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ है. इसलिए प्रश्नगत विक्रय संवव्यवहार से अभियुक्तगणों को कोई वास्तवित सदोष लाभ नहीं हुआ है तथा परिवादी या किसी अन्य व्यक्ति को कोई सदोष हानि पहुंचाना भी परीलक्षित नहीं होता है. प्रकरण में अवश्य प्रकट होता है कि अभियुक्तगणों ने सदोष लाभ प्राप्त करने के आशय से कथित विक्रय पत्र में विक्रय किए गए भाग की भूमि की गलत चर्तुसीमा का उल्लेख किया है, किंतु विक्रय पत्र में गलत चर्तुसीमा उल्लेखित करना कूटरचना की श्रेणी में नहीं आता है

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